चाहत का तूफ़ान

भारतीय कवि शंख घोष जी की मूल बंगला भाषा से सुलोचना वर्मा और शिव किशोर तिवारी द्वारा हिंदी भाषा में अनुवादित एक कविता अर्थात रचना।

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इस छोर से उस छोर तक घूमती नि:शब्द निर्जनता में
अन्धेरी शाम की तेज़ अकेली हवा में
तुम उठाती हो अपना
बादलों-सा ठण्डा, चान्द की तरह पाण्डुर
नीरक्त, सफ़ेद चेहरा
विपुल आकाश की ओर,

दूर देस में मैं काँपता हूँ
चाहत की असह्य वेदना से
तुम्हारे श्वेत पाषाण-सदृश मुख को घेरे
काँपती हैं
आर्त प्रार्थना में उठी हज़ार उँगलियों की तरह
बालों की पतली लटें, बिखरी अलकें
अन्धेरी हवा में,

घिर आए बादल अपने ही भार से आकाश के एक कोने में जमा हो गए
उस पुंज के बीच बार-बार ज़ोर से कौंधती है
कामना की तड़ित्
प्रचण्ड आवेग से फेनिल होता प्रेम का अबाध्य प्रवाह
अन्धकार के सीमाहीन अन्तराल और
विचारमग्न, स्थिर धरित्री की घन कान्ति को
अस्थिर करता है,

तुम उठाती हो अपना
बादलों-सा ठण्डा, चान्द की तरह पाण्डुर मुख
रोते-रोते थककर चुप हुई धरती के उठते-गिरते स्तन,
प्रार्थना में क्लान्त, विकल, दुर्बल, दीर्घ प्रत्याशा के हाथ
विपुल, विक्षुब्ध आकाश की ओर उठे
और सबको घेरकर फैला अन्धकार, तुम्हारे विरल केश
असीम, एकाकी हवा में असंख्य स्वरों वाले वाद्य,

धीरे-धीरे सृष्टि प्रस्तुत होती है, मानो
मर्मभेदी एक मधुर मुहूर्त में दु:सह वज्र बनकर टूटता है उसकी चाहत का बादल
तुम्हारे उद्धत, उत्सुक, प्रसारित, विदारित वक्ष के मध्य
मिलन की पूर्ण प्रेमाकुलता के साथ
उसके बाद भीगी, अस्तव्यस्त, भग्न पृथ्वी की गन्दगी साफ़ कर
आता है सुन्दर, शीतल, ममता-भरा विहान।

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