जलती हुई बस्ती को कोई बुझाने नहीं वाला

जलती हुई बस्ती को कोई बुझाने नहीं वाला
ढहती हुई मिटटी को कोई उठाने नहीं वाला

अपने परों से उड़ना है अब तुझे आसमानों में
सहमे हुए दिल को कोई भी सजाने नहीं वाला

नाकाम होकर भी उसने दाग़ मुझ पर लगा डाला
बढ़ती ‘अदावत को कोई भी घटाने नहीं वाला

आओ उसे भी उसका बदला दिलाते हुए जाएँ
हक़ तो हुकूमत से यूँ कोई जताने नहीं वाला

अपनी रज़ामंदी या अपनी ख़ुशी चाहिए सबको
इक दूसरे की अब कोई भी चलाने नहीं वाला

हर घाव तेरा, रंजिश तेरी हुकूमत हिलाती है
यूँ सामने तेरे हाकिम भी चलाने नहीं वाला

आराम करना है तो अब सोचना ही पड़ेगा कुछ
यूँ बैठकर तो ‘आसिफ़’ कोई खिलाने नहीं वाला

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