हाथ खुद छुड़ाने से क्या होगा

हाथ खुद छुड़ाने से क्या होगा
दूर उससे जाने से क्या होगा

तोड़ना है तो फिर महल तोड़ो तुम
बस्तियाँ गिराने से क्या होगा

लोग टूट जाते हैं लुटा कर घर
दर्द बस जताने से क्या होगा

‎‎ख़ासकर ग़रीबी ही परेशाँ है
आस भी लगाने से क्या होगा

बह गई सियासत सख़्त पानी में
हुक्म भी चलाने से क्या होगा

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