सहेलियां साजन घर आया हो

पिया मोहि दरसण दीजै हो
बेर बेर मैं टेरहूं, या किरपा कीजै हो
जेठ महीने जल बिना पंछी दुख होई हो
मोर असाढ़ा कुरलहे घन चात्रा सोई हो,

सावण में झड़ लागियो, सखि तीजां खेलै हो
भादरवै नदियां वहै दूरी जिन मेलै हो
सीप स्वाति ही झलती आसोजां सोई हो
देव काती में पूजहे मेरे तुम होई हो,

मंगसर ठंड बहोती पड़ै मोहि बेगि सम्हालो हो
पोस महीं पाला घणा,अबही तुम न्हालो हो
महा महीं बसंत पंचमी फागां सब गावै हो
फागुण फागां खेलहैं बणराय जरावै हो,

चैत चित्त में ऊपजी दरसण तुम दीजै हो
बैसाख बणराइ फूलवै कोमल कुरलीजै हो,
काग उड़ावत दिन गया बूझूं पंडित जोसी हो
मीरा बिरहण व्याकुली दरसण कद होसी हो।

राग देस

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