उलझी हुई सोचों की गिर्हें खोलते रहना

Uljhi Hui Sochon Ki Girhen Kholte Rahna - उलझी हुई सोचों की गिर्हें खोलते रहना

उलझी हुई सोचों की गिर्हें खोलते रहना अच्छा है मगर इन में लहू घोलते रहना, दिन भर किसी मंज़र के तआक़ुब में भटकना और शाम को लफ़्ज़ों के नगीं रोलते रहना, मैं लम्हा-ए-महफ़ूज़ नहीं रुक न सकूँगा उड़ना है मिरे संग तो पर तौलते रहना, ख़ामोश भी रहने से जनाज़े नहीं रुकते जीने के लिए … Read more

खुले दिलों से मिले फ़ासला भी रखते रहे

Khule Dilon Se Mile Fasla Bhi Rakhte Rahe - खुले दिलों से मिले फ़ासला भी रखते रहे

खुले दिलों से मिले फ़ासला भी रखते रहे तमाम उम्र अजब लोग मुझ से उलझे रहे, हनूत तितलियाँ शो-केस में नज़र आईं शरीर बच्चे घरों में भी सहमे सहमे रहे, अब आइना भी मिज़ाजों की बात करता है बिखर गए हैं वो चेहरे जो अक्स बनते रहे, मैं आने वाले दिनों की ज़बान जानता था … Read more