ज़ब्त अपना शिआर था न रहा

aankh uthai hi thi ki khai chot - ज़ब्त अपना शिआर था न रहा

ज़ब्त अपना शिआर था न रहा दिल पे कुछ इख़्तियार था न रहा, दिल-ए-मरहूम को ख़ुदा बख़्शे एक ही ग़म-गुसार था न रहा, आ कि वक़्त-ए-सुकून-ए-मर्ग आया नाला ना-ख़ुश-गवार था न रहा, उन की बे-मेहरियों को क्या मालूम कोई उम्मीद-वार था न रहा, आह का ए’तिबार भी कब तक आह का ए’तिबार था न रहा, … Read more

आँख उठाई ही थी कि खाई चोट

aankh uthai hi thi ki khai chot - आँख उठाई ही थी कि खाई चोट

आँख उठाई ही थी कि खाई चोट बच गई आँख दिल पे आई चोट, दर्द-ए-दिल की उन्हें ख़बर क्या हो जानता कौन है पराई चोट, आई तन्हा न ख़ाना-ए-दिल में दर्द को अपने साथ लाई चोट, तेग़ थी हाथ में न ख़ंजर था उस ने क्या जाने क्या लगाई चोट, यूँ न क़ातिल को जब … Read more