ये पैरहन जो मिरी रूह का उतर न सका

Ye Pairahan Jo Meri Ruh Ka Utar Na Saka - ये पैरहन जो मिरी रूह का उतर न सका

ये पैरहन जो मिरी रूह का उतर न सका तो नख़-ब-नख़ कहीं पैवस्त रेशा-ए-दिल था, मुझे मआल-ए-सफ़र का मलाल क्यूँ-कर हो कि जब सफ़र ही मिरा फ़ासलों का धोका था, मैं जब फ़िराक़ की रातों में उस के साथ रही वो फिर विसाल के लम्हों में क्यूँ अकेला था, वो वास्ते की तिरा दरमियाँ भी … Read more

चार-सू है बड़ी वहशत का समाँ

Chaar-Su Hai Badi Wahshat Ka Saman - चार-सू है बड़ी वहशत का समाँ

चार-सू है बड़ी वहशत का समाँ किसी आसेब का साया है यहाँ, कोई आवाज़ सी है मर्सियाँ-ख़्वाँ शहर का शहर बना गोरिस्ताँ, एक मख़्लूक़ जो बस्ती है यहाँ जिस पे इंसाँ का गुज़रता है गुमाँ, ख़ुद तो साकित है मिसाल-ए-तस्वीर जुम्बिश-ए-ग़ैर से है रक़्स-कुनाँ, कोई चेहरा नहीं जुज़ ज़ेर-ए-नक़ाब न कोई जिस्म है जुज़ बे-दिल-ओ-जाँ, … Read more