की थी जिस को शक्ल-ए-महबूबी अता

Ki Thi Jis Ko Shakl-E-Mahbubi Ata - की थी जिस को शक्ल-ए-महबूबी अता

की थी जिस को शक्ल-ए-महबूबी अता सर उसी पत्थर से ज़ख़्मी हो गया, हर घड़ी रहता था आईना-ब-दस्त ख़ुद-सताई के सिवा करता भी क्या, हो गया जब उस को इदराक-ए-जहाँ तोड़ कर आईना उस ने रख दिया, वो हुआ है पैरहन का यूँ असीर खुल के अब हँसना भी मुश्किल हो गया, इस से बढ़ … Read more

हूँ बे-सुराग़ राह नापता हूँ

Hun Be-Suragh Rah Napta Hun - हूँ बे-सुराग़ राह नापता हूँ

हूँ बे-सुराग़ राह नापता हूँ इस तर्फ़ उस तर्फ़ को भागता हूँ, वो कब का मकाँ कर गया है ख़ाली इक लाग है दर को ताकता हूँ, था क़ुर्ब ही क़ुर्ब हासिल इक दिन अब ख़्वाब में उस के जागता हूँ, पम्बा-ब-गोश हो जाएँ सामेअ’ मैं शोर की हद फलांगता हूँ, नाज़ुक है बहुत ये … Read more